लॉकडाउन के बाद भारत अपने लोगों की सेहत और उनके आर्थिक हितों को कैसे नियंत्रित करता है, यह दुनिया के लिए एक सबक हो सकता है

आज विश्व मलेरिया दिवस है। इसके मरीजों की संख्या के मामले में भारत नाइजीरिया के बाद दूसरे नंबर पर आता है। बीते साल यहां मलेरिया से 45 हजार मौतें हुई थीं। दुनिया में हर साल 4 लाख मौतें इससे होती हैं। मलेरिया को जड़ से खत्म करने के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा गठित सलाहकार समूह के चेयरमैन प्रो. मार्सेल टैनर ने दैनिक भास्कर के रितेश शुक्ला से मलेरिया और कोविड-19 पर बात की। प्रो. टैनर एक एपिडिमोलॉजिस्ट और स्विट्जरलैंड में कोविड-19 टास्कफोर्स के सदस्य भी हैं।

भारत-अफ्रीकी देशों में मलेरिया के सबसे ज्यादा मामले हैं। यहां कोरोना उतना प्रभावी नहीं है, जितना यूरोप और अमेरिका में है। क्या इनमें कोई संबंध है?
यह सच है कि वो 11 देश जहां मलेरिया के सबसे ज्यादा मरीज हैं, वहां कोरोना संक्रमण यूरोप-अमेरिका की तुलना में कम है। पुर्तगाल में कोविड-19 का संक्रमण कम है और पड़ोसी स्पेन में यह महामारी बन चुका है। पुर्तगाल में बीसीजी का टीका अनिवार्य है, जबकि स्पेन में नहीं। भारत में भी बीसीजी के टीके का प्रचलन है। मलेरिया या टीबी जैसी बीमारियों से बचने के लिए लगाए जा रहे वैक्सीन से प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है या नहीं यह जांच और शोध का विषय है। फिलहाल इसको लेकर कोई स्टडी नहीं है। इसलिए अधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।
मलेरिया क्यों होता है और उससे कैसे बचा जाए। यह दोनों बातें मालूम हैं, पर इसे खत्म नहीं कर सकते है। ऐसे में कोविड-19 जैसी बीमारियों का क्या होगा?
किसी भी महामारी या संक्रामक बीमारी से बचने के लिए निगरानी (सर्विलांस) और प्रतिक्रिया (रिस्पांस) का होना जरूरी है। मलेरिया के केस में िरस्पांस क्या होना चाहिए, यह तो पता है लेकिन निगरानी के बिना हमारे कदम कारगर साबित नहीं होंगे। कोविड और ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि वैक्सीन नहीं है। निगरानी भी मुश्किल है। ऐसे में निगरानी पर फोकस बढ़ाना होगा।
100 वर्षों में हुई महामारियां कि संख्या से पहले की कुल महामारियों से ज्यादा हैं। क्या वजह है?
पिछले 100 वर्षों में आबादी का पलायन तेजी से बढ़ा है। इसमें जलवायु परिवर्तन का भी योगदान है। पलायन के कारण महामारी की संभावना बढ़ जाती है। जैसे भारत में कोविड-19 के बाद कामगार अपने घरों को पलायन करने के लिए मजबूर हो गए हैं। ऐसे ही वर्षों पहले चंगेज खान के आक्रमण के कारण बड़ी संख्या में एशिया से आबादी का पलायन यूरोप की तरफ हुआ था। इसी समय पर ब्लैक डेथ का संक्रमण एशिया से यूरोप में फैला था। सही मायने में आबादी का पलायन एक प्रमुख विषय है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
भारत लॉकडाउन में ढील देने पर विचार कर रहा है। भारत को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
लॉकडाउन का असर सामाजिक और आर्थिक दोनों क्षेत्र में पड़ रहा है। यह सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से ही हटना चाहिए। एकदम से हटाने पर भीड़ जुटेगी और स्थिति बेकाबू हो सकती है। ऐसी स्थिति में सामाजिक और आर्थिक कीमत कहीं ज्यादा चुकानी पड़ सकती है। सोशल डिस्टेंसिंग के साथ साफ-सफाई का ध्यान रखना होगा और मास्क भी लगाना होगा। जगह-जगह पर हाथ धोने के स्टेशन बनाने पड़ेगे। जापान, दक्षिण काेरिया और चीन की तरह यहां के लोगों को मास्क लगाना अपनी आदत में शामिल करना होगा। खुद तीन मास्क बनाने होंगे ताकी एक आप पहनें, दूसरा जो धोकर सूखने के लिए छोड़ेंं और तीसरा रिजर्व में रखना होगा।

क्या महामारी से लड़ने के लिए दुनिया भारत से सबक ले सकती है?
यूरोपीय देश सोच, व्यवहार और चिंतन में खुद को चीन और दक्षिण कोरिया की तुलना में भारत को अपने करीब पाते हैं। भारत में जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है यहां कामगार एक राज्य से दूसरे राज्य आते-जाते हैं। एेसा ही यूरोप में होता है। एेसे में लॉकडाउन के बाद भारत इनके स्वास्थ्य और आर्थिक हितों को कैसे नियंत्रित करता है, यह मैनेजमेंट दुनिया के लिए एक सबक हो सकता है।



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