यूरोप के दो देशों से सीखिए- किस तरह कोरोना के खतरे को समझा, तैयारियां की और फिर उसे फैलने से रोका

मार्च के दूसरे हफ्ते में यूरोप कोरोना का नया केंद्र बनता जा रहा था। चीन के बजाय दुनिया का ध्यान यूरोप पर केंद्रित हो गया था। आने वाले दिनों में ये साबित भी हो गया। देखते ही देखतेइटली, स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन तेजी से इसकी चपेट में आ गए। तब जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल का बयान आया था, जिसने लोगों को सकते में डाल दिया था। मर्केल ने कहा था कि जर्मनी की 70% आबादी संक्रमित हो सकती है।

मर्केल ने खुद को क्वारैंटाइन किया, तो लगा जर्मनी में भी हालात इटली और स्पेन जैसे हो सकते हैं। पर एक महीने बाद इटली, स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन में हर दिन सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है वहीं, जर्मनी यूरोपीय देशों से कहीं बेहतर स्थिति में है। देश में 14 हजार लोग संक्रमित हैं, वहीं 3868 मौतें हुई हैं।

जर्मनी में बहुत पहले टेस्ट किट पूरे देश में पहुंचा दी गईं
दरअसल जर्मनी ने जनवरी के शुरू में ही टेस्ट करने की तैयारी कर ली थी और टेस्ट किट बना भी ली थी। पहला मामला फरवरी में आया था, पर इससे पहले ही पूरे देश में टेस्ट किट पहुंचा दी गई थीं। इसका नतीजा ये हुआ कि दक्षिण कोरिया की तरह न सिर्फ ज्यादा टेस्टिंग हुई बल्किइसी आधार पर लोगों को अस्पतालों में भर्ती भी कराया गया। कई शहरों में टेस्टिंग टैक्सियां भी चलाईं गई, जो लॉकडाउन के दौर में घर-घर जाकर टेस्ट करती हैं। इससे समय पर इलाज में आसानी हुई।

टेस्टिंग से लेकर नतीजे तक, सारे काम घर पर ही हो गए

स्वास्थ्य अधिकारियों ने लोगों तक ये संदेश दिया कि अगर किसी को लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो उसे अस्पताल आने की जरूरत नहीं है। टेस्टिंग से लेकर नतीजे तक सभी काम घर पर रहकर ही हो जाएंगे।रॉबर्ट कॉख इंस्टीट्यूट के प्रेसिडेंट लोथर वीलर के मुताबिक देश में हल्के लक्षण वालों को भी ढूंढा गया, जो बाद में गंभीर हो सकते थे। जर्मनी ने टेस्टिंग के साथ-साथ ट्रैकिंग को भी उतनी ही प्राथमिकता दी।

समय रहते जर्मनी ने सख्त कदम उठाए
टेस्टिंग के साथ-साथ ट्रैकिंग में भी सख्ती रखी गई। इन सबके अलावा जर्मनी ने समय रहते सख्त कदम उठाए। चाहे सीमाएं बंद करनी हों या फिर सोशल डिस्टेंसिंग का फैसला।लोगों ने चांसलर मर्केल का समर्थन किया। इसी कारण देश में पूर्ण लॉकडाउन न होते हुए भी लोग पाबंदियों का पालन कर रहे हैं। और ये एक बड़ी वजह है कि जर्मनी में कम लोगों की मौत हुई है।

4 मई से खुल सकता है लॉकडाउन, पर सख्ती भी जारी रहेगी

जर्मनी ने लॉकडाउन से बाहर आने की तैयारी कर ली है। 30 अप्रैल को एक बार रिव्यू किया जाएगा। इसके बाद 4 मई से स्कूलों को शुरू किया जाएगा। डे केयर सेंटर, धार्मिक कार्यक्रम, रेस्तरां, सिनेमा 31 अगस्त तक बंद रहेंगे। ऑफिस में कम से कम डेढ़ मीटर की दूरी रखनी होगी। इसके अलावा 7500 कंपनियों ने शॉर्ट टर्म वर्क शुरू करने की मंजूरी मांगी है, इस पर भी विचार किया जा रहा है।

विएना: इमरजेंसी के लिए बनाए गए फील्ड हॉस्पिटल और आईसीयू बेड खाली

वहीं,ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना के उत्तर में शुरू हुए नए अस्पताल में पार्किंग क्षेत्र, गलियारे सूने हैं। कांच की दीवारों से कुछ मेडिकल स्टाफ दिख जाता है। अभी यहां विजिटर्स को आने की अनुमति नहीं है। इटली और स्पेन की तरह यहां के हॉस्पिटल कोरोना के मरीजों के बोझ से दबे नहीं हैं। स्थिति नियंत्रण में है। देश में करीब 1000 करोना मरीजों का इलाज चल रहा है। इनमें से 250 आईसीयू में हैं। जल्दी से बनाए गए सैकड़ों बिस्तरों वाले फील्ड हॉस्पिटल भी खाली हैं। एक तिहाई आसीयू बिस्तरों की भी यही स्थिति है।

स्थिति संभालने की बड़ी वजह है, जल्दी लॉकडाउन

देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि यहां पर 24 घंटे में आने वाले मामले 122 तक घट गए हैं, जबकि 26 मार्च को कुल मामले 966 थे।स्थिति संभालने की बड़ी वजह है, जल्दी लॉकडाउन। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सीनियर रिसर्च फैलो थॉमस जिपिओंका बताते हैं कि ऑस्ट्रिया ने 16 मार्च को ही लॉकडाउन लागू कर दिया था, जबकि बाकी देश इस बारे में सोच ही रहे थे।

बाहर घूमने वाल 17 हजार लोगों पर भारी भरकम जुर्माना लगाया गया

ब्रिटेन ने 23 मार्च को इस पर फैसला लिया था। थॉमस के मुताबिक, ऑस्ट्रिया का एक हिस्सा इटली की सीमा से भी जुड़ा है। पर सख्त फैसलों और हर बात पर बारीक नजर ने कोरोना को फैलने नहीं दिया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस पेट्रोलिंग होती है। बाहर घूमने वाल 17 हजार लोगों पर भारी भरकम जुर्माना लगाया गया। ज्यादातर लोगों को सेल्फ क्वारैंटाइन रखा गया। इसलिए कोरोना ऑस्ट्रिया पर हावी नहीं हो सका।



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जर्मनी में 14 अप्रैल तक 1.3 लाख केस थे, जबकि अब तक 64 हजार से ज्यादा लोग रिकवर हो चुके हैं।


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