जॉर्ज फ्लॉयड की मौत पर प्रदर्शन: जिनका स्टोर्स लूटा गया, वे कहते हैं- 11 साल यहां रहते हो गया, पहली बार ऐसी अराजकता देखी

अंबरिश ठाकर मूल रूप से गुजरात केअमरेली जिले के राजुला के हैं। 2009 से वे शिकागो में निवास कर रहे हैं। शिकागो और आसपास के इलाकों में मोटेल, लिकर-ग्रोसरी और हेल्थ-वेलनेस स्टोर्स चलाते हैं। अमेरिका में फैली हिंसा के दौरान उनके स्टोर्स में भी लूट और तोड़फोड़ की गई। हिंसा के बारे में उन्होंने आपबीती बताई।

अंबरिश बताते हैं कि शिकागो के अलावा अन्य राज्यों में 28 मई को शुरू हुए दंगों को लेकर हम सभी चिंतित थे। हमारा मानना था कि उपनगरों में ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए शनिवार को हमने बाजार खोला। हमें लगातार चेतावनी भी दी जाती रही। कोरोना की विपत्ति में फंसे और डरे-सहमे गुजरातियों या अन्य भारतीयों को मैं मुफ्त में अपने मोटल में रहने की अनुमति देता हूं।

सड़क पर उतर आई हिंसक भीड़
शनिवार दोपहर को उपनगरों में तनाव बढ़ गया, बड़ी संख्या में अश्वेतदंगाइयों की भीड़ सड़क पर उतर गई। किसी को न कानून की परवाह थी और न ही पुलिस की। हिंदी फिल्म एयरलिफ्ट जैसे दृश्य सड़क पर दिखाई दे रहे थे। स्थिति ऐसी थी कि हम दुकान बंद नहीं कर सकते थे। क्योंकि बंद करके दुकान के अंदर दुबक जाना और भी खतरनाकथा।

भीड़ में अश्वेत ही नहीं गोरे भी थे
हमें क्या करना चाहिए, अभी हम इस पर विचार कर ही रहे थे कि करीब 500 लोगों की भीड़ हमारे स्टोर्स के इलाके में घुसने लगी। भीड़ में बड़ी संख्या में अश्वेतों के साथ-साथ कुछ गोरे भी शामिल थे। इनकी आंखों में केवल लूटपाट ही नहीं, बल्कि बदला लेने का आक्रोश साफ दिखाई दे रहा था। उनका हिंसक व्यवहार भी हालात की सूचना दे रहा था।

दंगाई लूट की पूरी तैयारी से आए थे
ये दंगे पूरी योजना बनाकर किए गए। दंगाईहथौड़े, मेटल कटर, पाइप के अलावा ऑटोमैटथ्कगन लेकर खुले आम बेखौफ घूम रहे थे। मुझे अमेरिका में 11 साल हो गए, लेकिन ऐसी अराजकता और हिंसक स्थिति मैंने पहले कभी नहीं देखी। मेरे स्टोर के आसपास के स्टोर्स, शॉपिंग काम्पलेक्स में तोड़फोड़ शुरू हुई, तभी मैं समझ गया कि अब हमारी बारी है। यदि हम इसका विरोध करते, तो हालात और भी बुरे हो जाते। पुलिस नहीं आ रही थी, तब हम अपनी बारी का इंतजार करते हुए अपने स्टोर्स में ही बैठे रहे।

हमारे स्टोर्स में की गई लूटपाट-तोड़फोड़
आखिर हमारी बारी आ ही गई। बड़ी संख्या में उपद्रवियों ने हमारे स्टोर्स में प्रवेश किया, अंदर आते ही हथौड़े से जहां पाए, वहां प्रहार करने लगे। कांच तोड़ दिया, शो-केस का सामान फर्श पर गिरा दिया। फर्नीचर तोड़ डाला। यहां तक की हथौड़े मारकर दीवार को भी नुकसान पहुंचाया। बाद में तिजोरी में रखा कैश लूट लिया।

आंखों के सामने होती रही लूटपाट
मेरे दोस्त नयन पटेल के स्टोर के भी यही हाल थे। उसके स्टोर पर 2000 लोगों ने धावा बोला। उसकी आंखों के सामने ही 3-4 घंटे तक बिना किसी डर के लूटपाट की। स्टोर पूरी तहस-नहस कर दी। एक भी चीज ऐसी नहीं बची, जिसका इस्तेमाल किया जा सके। लुटेरों ने उन्हें दुकान दोबारा खोलने पर जान से मारने की धमकी दी। हम लोगों ने डर के कारण अपने स्टोर्स अभी तक नहीं खोले हैं।

पुलिस का अतापता नहीं
आमतौर पर पुलिस की आपातकालीन सेवा 911 को बेहद भरोसेमंद माना जाता है, लेकिन इन दंगों में वह बिलकुल नाकाम साबित हुई है। 911 पर कई शिकायतें करने के बावजूद पुलिस शायद ही किसी जगह समय पर पहुंची हो। यह भी कहा जाता है कि लोगों की आक्रामकता को कम करने के लिए पुलिस ने जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया है।

न जाने हालात कब सुधरेंगे
डर का माहौल बना हुआ है। स्टोर्स की सुरक्षा के लिए हमने काफी कुछ किया है, लेकिन हमें मालूम है, जब तक पुलिस सक्रिय नहीं होती, तब तक कुछ भी सुरक्षित नहीं है। कोरोना संकट के कारण लोग दो महीने से घरों में कैद हैं। साढ़े 3 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। ऐसे में असामाजिक तत्वों को खुला मैदान मिल गया है। हम केवल अच्छे दिनों की राह ही देख सकते हैं कि सरकार कुछ करे, ताकि हालात पर काबू पाया जा सके और हम अपना कारोबार फिर से शुरू कर सकें।

(यह ग्राउंड रिपोर्ट अमेरिका के शिकागो से रेखा पटेल ने भास्कर के लिए तैयार की है। रेखा ने कई किताबें लिखी हैं। पिछले 20 सालों से वे कई मैगजीन और न्यूज पेपर से सम्बद्ध हैं।)



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यह तस्वीर शिकागो की दुकानों में शनिवार को की गई तोड़फोड़ की है। अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के विरोध में अमेरिका के कई शहरों में प्रदर्शन और दंगे हो रहे हैं। आरोप है कि पुलिस ने फ्लॉयड को हिरासत में लेकर उसकी गर्दन पर पैर रख दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी।


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